नवम्बर 30/2017

संस्कृत: नित्यानंदकरी वराभाकरी सौन्दर्यरत्नरी निर्धुताखिलघोरपावनकरी प्रत्यभिज्ञासाहेश्वरी। प्रालेयाचलवंशपावणकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षु देहि कृपावलम्बनकरी मातनन्पूर्णेश्वरी ॥1 प अनुवाद: नित्य- [अ] आनंद-करि वर-अभय-करि सौन्दर्य-रत्न- [अ] अकारि निर्धुता-अखिला-घोरा-पावना-करि प्रकृतिके-महेश्वरि | प्रलय-एकला-वामाश-पावना-करि काशी-पुरा-अधिश्वरी भिकस्साम देहि कृप-अवलम्बन-करि माता-अन्नपूर्णुने [(इति] श्वारि || १ || अर्थ: १.१: (माँ अन्नपूर्णा को प्रणाम) जो हमेशा अपने भक्तों को आनन्द देते हैं,

संवत्: योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोंदनग्निनंदनः। स्कंदः कुमारः सेनानीः स्वामी शंकरसंभवः ॥1 सेन अनुवाद: योगीश्वरो महा-सेना काह्तिकेयो [अ-आ] ज्ञानी-नन्दनाह | स्कन्ध कुमाराह सनेहनिह शवामी शंकरा-सम्भवः || १ || भावार्थ: १.१: (श्री कार्तिकेय को प्रणाम) एक मास्टर योगी कौन है, जिसे महासेना के नाम से जाना जाता है

देवी सीता (श्री राम की पत्नी) देवी लक्ष्मी का अवतार हैं, जो धन और समृद्धि की देवी हैं। लक्ष्मी विष्णु की पत्नी है और जब भी विष्णु अवतार लेते हैं वह उनके साथ अवतार लेते हैं।

श्री रंगनाथ, जिसे भगवान अरंगनाथार, रंगा और तेरांगथन के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण भारत में श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम के एक प्रसिद्ध प्रसिद्ध देवता हैं। देवता के रूप में चित्रित किया गया है

संस्कृत: कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा। बुद्ध आत्माणा वा प्रकृतिस्वभावात्। करोमि पन्त्सकलं परस्मै। नारायण्यति समर्पयामि सम अनुवाद: कैयना वकासा मनासे [aI] ndriyair-Vaa Buddhy [i] -आत्मन वा वा प्रकृते स्वभावात | करोमि यद-यत-सकलम् परसामै नारायणनायति समर्पयामि || अर्थ: 1: अपने शरीर, भाषण, मन या संवेदनाओं के साथ मैं जो कुछ भी करता हूं, 2: (जो भी मैं करता हूं

लक्ष्मी नृसिंह (नरसिम्हा) करावलंबम स्तोत्र संस्कृत: संसारसागरविशालकरकालकाल_ नृग्रग्रन्सननिग्रहविग्रहस्य। व्यग्रस्य रगरसनोर्मिनिपीडितस्य लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥५५ सन अनुवाद: संसार-सागर-विशाला-कराल-काल_ नक्र-ग्रहा-ग्रासना-निग्रह-विग्रहस्य | व्याग्रस्य राग-रसनो [एयू] रमी-निपिदितस्य लक्ष्मि-नृसिम् मम देहि कर-अवलम्बम् || ५ || अर्थ: ५.१: (श्री लक्ष्मी नृसिंह को प्रणाम) इस विशाल में

ये भगवान गुरुदेव के स्तोत्र हैं जो एक बहुत शक्तिशाली देवता थे। उनकी पूजा करने से लोगों को प्रार्थनाओं से मेरा सौभाग्य मिलता है। संस्कृत: भवसागर तारण कारण हे। रविनंदन बन्धन खण्डन हे न् शरणागत कि मकर भीत मने। गुरुदेव दया करो दीनजने ॥XNUMX ीन